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रवीश कुमार ने मीडिया पर कसा तंज ,कहा -जो चैनल और ऐंकर पत्रकारिता का धर्म नहीं बचा सके, उनसे एक महान धर्म की क्या ही रक्षा होगी

 जो चैनल और ऐंकर पत्रकारिता का धर्म नहीं बचा सके, वे इनदिनों हिन्दू धर्म के रक्षक बन रहे हैं। जिन्होंने अपने पेशे के धर्म के साथ दुराचार किया है, उनसे एक महान धर्म की क्या ही रक्षा होगी। वे हिन्दू धर्म की आड़ में अपने भांड होने पर पर्दा डाल रहे हैं।

Ravish kumar on media
           Image source-google 
इन चैनलों ने धर्म के भीतर के शानदार विमर्शों को भी रौंद दिया है। धर्म का सहारा इसलिए लेते हैं ताकि जो जनता जान गई है कि ये लोग पत्रकार नहीं हैं, उनके बीच धर्म का नाम लेकर फिर से आ जाएं। यही कारण है कि बहुत से अच्छे दर्शकों ने न्यूज़ चैनल को देखना छोड़ दिया है। मेरी यह चेतावनी याद रखिएगा। न्यूज़ चैनल( और मैं इसमें कोई अपवाद नहीं रखता) भारत के लोकतंत्र ही नहीं, एक महान धर्म की उदारता को रौंद रहे हैं। बर्बाद कर रहे हैं। ये अपना धंधा कर रहे हैं। धर्म की चिन्ता है तो धर्म की ही चिन्ता कीजिए। उस मंच पर जाकर नहीं, जहां किसी प्रकार का धर्म नहीं बचा है। 
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यह रिसर्च रमित वर्मा का है। ट्विटर और इंस्टा पर क्रूरदर्शन के नाम से इनका हैंडल है। केवल पांच चैनलों ने 150 डिबेट शो में 138 बार धर्म से संबंधित मुद्दों पर डिबेट किया है। यह तो केवल पांच चैनलों का आंकड़ा है। भारत में तो इससे भी अधिक न्यूज़ चैनल हैं। सोचिए किस रफ़्तार से ये लोग अपने पेशे का धर्म गिरवी रखकर धर्म के मुद्दे से अपनी दुकान चला रहे हैं और समाज में ज़हर फैला रहे हैं। 
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एक बार फिर गुज़ारिश है, ऐसे चैनलों को देखना बंद कीजिए और जो भी चैनल इस रास्ते पर चले, अपने पेशे का धर्म छोड़ दे, उसे देखना बंद कर दीजिए। ये लोग धार्मिक मुद्दों के नाम पर धर्म की गरिमा गिरा रहे हैं। इन्हें कम से कम शास्त्रों में बताए गए बहस के नियमों के बारे में ही पढ़ लेना चाहिए। इनकी हरकतों से लगता है कि उसका भी ज्ञान नहीं है। लठैत की तरह लाठी भांजे जा रहे हैं। 

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कितनी बार कहा कि न्यूज़ चैनल मत देखिए। केबल पर न यू ट्यूब पर। कौन सी ऐसी सूचना होती है, जिसके बिना आपका जीवन नहीं चलेगा। आपसे इतना भी नहीं होता है कि चैनलों को सब्सक्राइब करना बंद करें।क्या आप अपने प्यारे वतन के लिए इतना भी नहीं कर सकते हैं? चैनलों की दुनिया में सुधार की हर गुज़ाइश ख़त्म हो गई है। कुछ भी बोलने का फ़ायदा नहीं रहा। न्यूज़ चैनलों को देखना क्यों नहीं बंद कर सकते। इससे आसान आंदोलन कुछ नहीं हो सकता।

रवीश कुमार (सोर्स-फेसबुक)

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